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विधानसभा चुनाव 2018: हाथ में मोबाइल, पेट है खाली

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में वोटरों को ललचाने के लिए खैरात की सियासत हो रही है। पहले ऐसी खबर सिर्फ दक्षिण राज्यों से आती थी। वोटरों को साड़ी, जूते-चप्पल, पानी की बोतल बांट दी जाती थी। इसमें मकसद वोट पक्का करना था ही, साथ ही सहानुभूमि में वोटर उस नेता को मसीहा के रूप में भी देखता था। इस गिफ्ट कल्चर ने दक्षिण में नेताओं के बहुत अनुयायी बनाए हैं। उत्तरी और मध्य राज्यों में उलट स्थिति दिखी। पार्टियां सत्ता में आने पर विकास पर वोट मांगती रही हैं। नब्बे केदशक में खतरा यह दिखा कि वोटर सरकारों के विकास के दावों को छलावा मानकर सत्तारूढ़ दल को पटकनी देना लगा। इसमें सत्ता परिवर्तन की रफ्तार तेज हो गई।

मुझे याद है कि वोटरों को साधने की पहली बड़ी लोकप्रिय पीडीएस योजना एक रुपए में बीपीएल को चावल बांटने की रही। कालाहांडी जैसी भुखमरी का उपाय इसमें खोजा गया। छत्तीसगढ़ में एक रुपए के चावल ने मुख्यमंत्री रमन सिंह की इमेज को चावल वाला बाबा बना दिया। तर्क दिया गया कि यह चावल उन आदिवासी इलाकों में भुखमरी रोकेगा, जहां कालाहांडी जैसे हालात हैं। कालाहांडी छत्तीसगढ़ से सटा ओडिशा का हिस्सा है। केन्द्र में मनमोहन सरकार की मनरेगा ने कांग्रेस को फिर सत्ता में ला दिया। यह योजना सरकारी परिसम्पत्तियां जोडऩे की बजाय गड्ढे खोदने और उन्हें भरने तक सीमित रही। यानी टोटल ओबलिगेटरी। मकसद बीपीएल को नकदी देना था।

उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने टॉपर्स को लेपटॉप बांटकर सियासत को नए जमाने का आइडिया दिया। सभी सरकारों को यह भा गया। हालांकि, यह उन्हें सत्ता में दोबारा नहीं ला सकी। लेपटॉप जैसे गैजेट्स की शुरूआत राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी हुई। लेकिन, यह सत्ता में आने का कारगर हथियार नहीं बन सका। इसमें खामी रही कि लेपटॉप बड़े वोटबैंक पर छाप नहीं छोड़ पाया। अधिकतर सरकारों नेें स्कूटी, साइकिल, साड़ी, जूते-चप्पल, बोतल और योजनाओं के बहाने नकदी बांटी। यहां तक कि मोदी सरकार ने वोटरों को रसोई तक सिलेण्डर तक भिजवा दिए। वोटर उच्चारण इसलिए, क्योंकि इन सरकारी गिफ्ट का टारगेट ग्रुप 18 साल से ऊपर का व्यक्ति ही होता है। कोई भी सरकार इतनी दयालु नहीं दिखी कि उसने बच्चों को खिलौने भी दिए हों।र्

पन्द्रह साल से मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में एक ही पार्टी की सरकार काबिज हैं। इनके मुख्यमंत्रियों ने खुद को सत्ता का अंगद बनाने के लिए खैरात का पिटारा खोला है। दोनों ही सत्ता के अनुभवी कप्तान हैं। वे जानते हैं कि सत्ता में एकछत्र रहना है तो जनता को योजनाओं के बहाने कैश या काइंड में दाना डालते रहो। इनकी निगाहें उस वोट बैंक पर है, जिनकी परचेज पावर जीरो है। लाडली योजना, तीर्थ दर्शन, मेधावी विद्यार्थी योजना, भावांतर जैसी योजनाओं ने शिवराज की टीआरपी बढ़ाई है। छत्तीेसगढ़ में रमन सिंह 22 अरब खर्च कर 50 लाख स्मार्ट फोन बांट रहे हैं। इस आदिवासी प्रदेश में शायद इतने ही राशन कार्ड होल्डर होंगे। स्मार्ट फोन उन लोगों को मिलेंगे, जिनकी दस रुपए की परचेज पॉवर भी नहीं है। सवाल यही है, हाथ में सरकार का मोबाइल तो होगा, लेकिन शाम तक पेट भरने का जुगाड़ हो पाएगा या नहीं, इसकी चिंता किसी सरकार को नहीं।

(इस लेख को पत्रिका मध्यप्रदेश के स्टेट हेड जिनेश जैन जी की फेसबुक वॉल से लिया गया है )

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