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NIT के ड्रॉप आउट स्टूडेंट ने बनाया OLX जैसा ऐप, हैदराबाद से मिला आॅफर ठुकराया देसी ऐप से खुद को किया X-Change

रायपुर. यूं तो समान को खरीदने बेचने देश भर में कई एप्लिकेशन तैयार किये जा चुके हैं। इस मामले में छत्तीसगढ़ के युवा भी पीछे नहीं हैं आज व्स्ग् एप को कौन नहीं जानता पर इसे इस्तेमाल करते वक्त हम अक्सर भूल जाते हैं कि इस ऐप से लेन-देन करने पर जो रेवन्यू जनरेट होता है उससे अपने देश को कोई फायदा नही होता, बल्की वो सारा पैसा ओएलएक्स को चलाने वाली नीदरलैंड की कम्पनी के मालिकों को मिलता है। जबकी ओएलएक्स जैसी कम्पनियों को पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा फायदा हमारे देश से ही होता है। एक बार खरीदी बिक्री के बैड एक्सपीरियंस के बाद से संतोष ने ठान लिया कि वो अपने देश के लोगों के लिए अपना देसी ऐप बना कर देगें।

https://play.google.com/store/apps/details?id=com.xchange.store

लेकिन रास्ता बिल्कुल भी आसान नही था। घर की कंडीशन भी इतनी अच्छी नही थी कि अपना खुद का स्टार्टअप शुरू कर सकें। परिवार की जिम्मेदारियों की वजह से बाहर भी नही जा सकते थे। हैदराबाद से एक मल्टी नेशनल कम्पनी से आॅफर आया भी लेकिन छोटा भाई और बीमार मां-बाप को छोड़ कर जा नही सके। ऐसे में दोस्तों से मदद मागी और एक साल पहले ही शुरूआत की। हमारे संवाददाता से हुई संतोेष की खास बातचीत.

लास्ट बेंचर ने किया कमाल
सन्तोष बताते है कि जब वे स्कूल में थे काफी शर्मीले मिजाज के होने कारण वे लास्ट बेंच सीटर हुआ करते थे। इसके बावजूद क्लास के 70 विद्यार्थियों में वे अकेले ऐसे थे जिनका एनआईटी में एडमिशन हुआ। जिसके बाद से ही इनके सपनो की दशो-दिशा बदलने लगी। घर की स्थिती कमजोर हाने की वजह से सन्तोष दस साल की उम्र में अखबारों को घर-घर पहुँचाने का काम करते थे। लेकिन एनआईटी में उनका एडमिशन होना किसी बडे सपने से कम नहीं था।


इंसपिरेशन कहां से मिली?
सरकारी स्कूल से पढ़ने के बाद एनआइटी में एडमिशन मिल तो गया लेकिन कुछ दिनों तक खुद को भरोसा ही नही हो रहा था कि मै यहां कैसे। कोई दोस्त भी नही था लेकिन कुछ दिनो में ही एक दोस्त जैसे गुरु मिले, मोहित साहू जो हैकर थे। वो दिन भर हैकिंग करते थे और मै उन्हें निहारता रहता था। जिसे देखकर मेरी जिज्ञासाओं ने उड़ान भरनी शुरू कर दीं।


कैसे आया इस एप को बनाने का विचारः
सन्तोष बताते हैं कि जब व्स्ग् पर चीजों की खरीदी बिक्री कर रहे थे। उसी समय उस विदेशी ऐप में एक बड़ी दिक्कत देखने को मिली वह यह थी कि अगर हमें गांव ऐरिया में इस एप का इस्तेमाल करना होता था तब एड्रेस पास के शहर का देना पड़ता था।

गाँवो में सुविधा पहुचाना बना उद्देश्यः
खरीदी .बिक्री के लिए गांव और शहर का फासला तय करना पड़ता था जिसके कारण उन्होंने ठाना की एक ऐसा एपिलेशन तैयार किया जाए जिसमें गांव के लोगों को भी समानों की खरीदी बिक्री करने में किसी बाधा का सामना न करना पड़ें। जिसके लिए उन्होंने अपने एप पर गाँवो के पिन नम्बर को जनरेट किया ताकि समान की खरीदी बिक्री गाँव.गांव में भी आसानी के की जा सके।
कई परेशानियों से हुआ सामनाः
इस पूरे सफर में परेशानी और ताकत दोनो की वजह बना परिवार। संतोष के लिए पहली परेशानी थी परिवार को इस काम को समझना चूंकि परिवार वाले दूर.दूर तक इस विषय मे कोई जानकारी नहीं रखते थे। इसके बावजूद पिता त्रिलोचन सिन्हा माता झुनिया सिन्हा ने हर समय साथ दिया। दूसरी परेशानी बनी आर्थिक समस्या पिता मिस्त्री का काम करते हुए संतोष को शिक्षा दी। इसके इतर उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि आर्थिक रूप से किसी भी प्रकार से सन्तोष की मदद कर सके जिसके कारण इस एप्लिकेशन को बनाने के काम मे देरी होते गयी। जुनून अभी भी उनके साथ था जिसके कारण अब उन्होंने इस एप्लिकेशन को पूरे एक साल में तैयार कर लिया है। जिसमें लोग काफी इंट्रेस्ट भी ले रहे हैं।

 

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