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राजनीतिक पार्टियों को नहीं मिलेगा आदिवासियों का आशीर्वाद !

रायपुर रिर्पोटरः- छत्तीसगढ़ में सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए राजनीतिक दल आदिवासियों को साधने की तो तमाम कोशिश कर रहे हैं। परन्तु इस बार के विधानसभा चुनाव में आदिवासी समाज ने संगठित होकर प्रदेष के 49 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोश्णा आदिवासी समाज ने कर दी है। बताया तो यह भी जा रहा है कि सर्व आदिवासी समाज को ओबीसी वर्ग के साथ-साथ आम आदमी पार्टी का भी समर्थन मिल रहा है। इससे इतर सर्व आदिवासी समाज का कहना है विधानसभा चुनाव 2018 में एक भी आदिवासी वोट भाजपा-कांग्रेस की झोली में नहीं जाने वाले। सूत्रों का यह भी कहना है की कसडोल विधायक गौरीषंकर अग्रवाल व रायपुर दक्षिण विधायक बृजमोहन अग्रवाल का इस चुनाव में हारना तय है। दावा किया जा रहा है कि इस बार छत्तीसगढ़ की सियासत में आदिवासियोुं का जोर देखने को मिलेगा।

आदिवासीयों को रिझाने की हर मुनकिन कोशिश
आदिवासीयों की नाराजगी को भापते हुए पक्ष-विपक्ष की दोनो पार्टियों ने समय.समय पर इनको लुभाने कि कोषिष की। ज्ञात हो कि पिछले कुछ दिनों में प्रदेष में राश्ट्पति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर विपक्ष के राहुल गांधी तक ने छत्तीसगढ़ का दौरा किया। आदिवासीयों को बहलाने.फुसलाने के लिए मुख्य सर संघचालक मोहन भागवत ने बैठक भी ली जिसमें केन्द्र से लेकर प्रदेष भर के आदिवास नेता, मंत्री मौजूद रहे।

पत्थलगढ़ी बना नाराजगी का प्रमुख मुद्दाः.

बता दें कि पिछले दिनों पत्थलगळढ़ी मुद्दे को लेकर सियासत गहराई थी। जिसमें प्रदेष सरकार ने स्पश्ट रूप से कह दिया था कि पत्थलगढ़ संविधान के विरूध्द है इसे कीसी भी तरह का रूप आकार देने के खिलाफ कार्यवाही भी जाएगी। वहीं आदिवासीयों ने भी पत्थलगढ़ मुद्दे को हर संभव स्पस्ट करते हुए कहा कि पत्थलगढ़ संविधान के विरूध्द नहीं है अपितु यह अपने क्षेत्र, संस्कृति व परम्परा की रक्षा के लिए लम्बे समय से चला आ रहा कानुन है। यह एक बड़ा कारण बना जिसके कारण आदिवासीयों ने राजनीति में उतरने का निर्णय लिया।

आदिवासीयों का समर्थन जरूरीः.

कहा जाता है प्रदेष में 32 फीसदी आबादी वाले आदिवासियों के समर्थन के बगैर किसी भी दल के लिए सरकार बनाना आसान नहीं होगा। वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य का गठन होने के बाद यहां पहला विधानसभा चुनाव वर्ष 2003 में हुआ था। तब 90 विधानसभा सीटों में से 46 सीटें अनारक्षित थीं जबकि 10 सीटें अनुसूचित जाति के लिए तथा 34 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित थीं।

इस चुनाव में बीजेपी ने 50 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी और 37 सीटें जीतकर कांग्रेस विपक्ष में बैठी थी। जब वर्ष 2008 में विधानसभा के चुनाव हुए तब परिसीमन के कारण अनारक्षित सीटों की संख्या बढ़कर 51 हो गई और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या घटकर 29 रह गई। हालांकि अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों की सख्या में कोई बदलाव नहीं हुआ। इस चुनाव में बीजेपी को 90 में से 50 सीटें मिली और कांग्रेस को एक सीट बढ़त के साथ 38 सीटों से संतोष करना पड़ा।

वर्ष 2013 के विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस को आदिवासियों का साथ मिला और उसने 29 में से 18 सीटों पर जीत दर्ज की। हालांकि बीजेपी इसके बावजूद अपनी सरकार बचाने में कामयाब रही। लेकिन यह संदेश भी गया कि बीजेपी पर आदिवासियों का भरोसा कम हो रहा है।

2013 के बाद अब 2018 के चुनाव होने हैं और इस बार आदिवासी दोनों ही बड़ी पार्टियों से नाराज लग रहे हैं। षायद इसीलिए अदिवासियों ने स्वयं चुनाव लड़ने का फैसला ले लिया है। अब देखना यह है कि प्रदेष में आदिवासीयों का यह संगठन सत्ता में काबिज होने और क्या जतन करता है। या फिर राजनीति उसी पुराने ढ़र्रे पर चलती रहेगी।

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