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मरवाही विधानसभा में होगा चुनावी घमासान… क्या जोगी के क्षेत्र में कांग्रेस लहराएगा परचम…या भाजपा तीन साल के पराजय के बाद करेगी वापसी?

जूली राजपूत रायपुर-छत्तीसगढ़ की मरवाही विधानसभा सीट में इस बार खिचंतान देखने को मिलने वाली है। प्रदेष के तीन प्रमुख पार्टीयों ने इस क्षेत्र में पूरा जोर लगा दिया है। जोगी परिवार की परंपरागत मानी जानी वाली इस सीट को बेटे अमीत जोगी ने पिता व पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी के लिए छोड़ दिया है। इस सीट को परंपरागत के अलावा भी मुख्य खासियत की वजह से जाना जाता रहा है। यह विधानसभा सीट दलबदलू नेताओं के नाम से भी चर्चित है। इसके साथ यह सीट आदिवासी समुदाय के लिए भी आरक्षित है। साथ ही कांग्रेस का गढ़ माना जाता है।
अपनी पार्टी से जोर लगाएगें अजीत जोगीः-
मध्य प्रदेश के समय से ही ये सीट काफी चर्चित सीट रही है, अजीत जोगी ने यहीं से जीतकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बनने का गौरव हासिल किया था। एक बार भी कांग्रेस से अलग हुए अजीत जोगी इसी क्षेत्र पर जोर लगा रहें हैं।
विकास के नाम पर षुन्यः-
हालाकि विकास के नजरिए से अगर देखा जाए तो कांग्रेस के हाथ में रहे इस विधानसभा क्षेत्र में थोड़ी भी तरक्की देखने को नहीं मिली है। आमजन की माने तो एक जमाने में राहुल गांधी ने यहां की जनता से विकास के कई दावे किए थे इसमें रोड के चैवड़ीकरण से लेकर षिक्षा की उचित व्यवस्था भी मौजूद है परन्तु मरवाही विधानसभा जाने के लिए पेन्ड्रा रोड स्टेषन उतरना पड़ता है वहां से मरवाही तक का सफर अपनी आप-बिती खुद बयां करती है।
मरवाही की खासियत
ये इलाका घने जंगलों से घिरा हुआ है। करीब डेढ़ लाख हेक्टयेर में जंगल फैला हुआ है। भालुओं के लिए भी ये इलाका काफी मशहूर है। इस इलाके में दुर्लभ सफेद भालू भी मिलते हैं।
2013 के विधानसभा चुनाव

मरवाही सीट पर 2013 में 11 उम्मीदवार मैदान में थे। कांग्रेस से अमित जोगी ने पिता की विरासत को बचाने में ही नहीं बल्कि रिकॉर्ड मतों से जीतने में कामयाब रहे थे। अमित जोगी को 82 हजार 909 वोट मिले थे। जबकि बीजेपी उम्मीदवार समीरा पैकरा को 36 हजार 659 वोट मिले थे।

मरवाही दलबदलू विधायकों का वर्चस्व
मरवाही सीट की कहानी दिलचस्प है। ये दलबदलू विधायकों का क्षेत्र रहा है। इसकी शुरूआत बड़े आदिवासी नेता भंवर सिंह पोर्ते से ही हो जाती है, जिन्होंने 1972 ,1977 और 1980 के चुनाव जीत कर हैट्रिक लगाई। 1985 में पार्टी ने उनका टिकट काट दिया और कांग्रेस के दीनदयाल विधायक बने। भंवर सिंह नाराज होकर कांग्रेस छोड़ दी और बीजेपी का दामन थाम लिया और 1990 में विधायक बने। 1993 में फिर बीजेपी ने उनका टिकट काट दिया और कांग्रेस के पहलवान सिंह मरावी इस सीट से विधायक बने। इसके बाद छत्तीसगढ़ का पृथक निर्माण 2001 में हुए जिसके बाद से यह विधानसभा जोगी की होकर रह गई। 2003, 2008 में अजीत जोगी लगातार यहां से विधायक रहे। 2013 में अमित जोगी ने इस सीट को छोड़ दिया था। अब 2018 में अमित पिता के लिए सीट छोड़ रहे है।
पिछड़ा जा रहा मरवाहीः-
यह इस क्षेत्र का दुर्भाग्य ही है कि बिलासपुर से 150 किलोमीटर दूरयहां का आदिवासी, विकास तो दूर अपने जिला मुख्यालय से भी इतनी दूर है, जहां तक पहुंचने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। लिहाजा ना तो उन्हें सरकारी योजनाओं की जानकारी मिलती है और न ही उनका सही तरह से क्रियान्वयन होता है। नतीजतन ये पिछड़ा इलाका और पिछड़ता जा रहा है।

मरवाही विधानसभा के लिए भाजपा की तैयारीः- लगातार तीन बार पराजय का मुंह देखने के बाद इस बार भाजपा ऐसे ताकतवर चेहरे की तलास में है जो इस बाद इस क्षेत्र में पार्टी का खाता खोल सके। यह जरूर कहा जा सकता है कि भाजपा किसी आदिवासी दावेदार पर दाव लगाएगी।
कांग्रेस कर रही गंभीरता से विचारः- अजीत जोगी के पार्टी से अलग होने के बाद इस विधानसभा क्षेत्र पर कांग्रेस भी गंभीरता से विचार कर रहें हैं। बताया यह जा रहा है कि पूर्व केन्द्रीय मंत्री चरणदास महंत इस ओर अपना रूख बनाए हुए हैं। साथ ही रामदयाल उईके भी इस क्षेत्र चुनाव लड़ सकते हैं।

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